17 फ़रवरी 2018

फन ज़माना झुके इस क़दर चाहिए. (गीतिका)


छंद- वाचिक स्रग्विणी (212 212 212 212)
पदांत- चाहिए
समांत- अर

प्‍यार करना अगर है जिगर चाहिए.
पार करना हो दरिया हुनर चाहिए.

हौसले ही न काफी हैं इस राह में,
ज़िंदगी को ख़ुदा की महर चाहिए.

जो चुनी राह तुमने है काँटों भरी,
हर क़दम दुश्‍मनों की ख़बर चाहिए.

है मुहब्‍बत की परवाज़ लंबी तभी,
आशियाँ को मुकम्‍मल शजर चाहिए.

ये जमाना परखता है सालों तलक,
फन ज़माना झुके इस क़दर चाहिए.

16 फ़रवरी 2018

चूल्‍हे की रोटी (गीतिका)

गीतिका 

अब भी आती याद गाँव की चूल्‍हे की रोटी.
घर-भर खाता साथ बैठ के, चूल्‍हे की रोटी.

ले फटकारे राख झाड़ के, घी चुपड़े थोड़ा,
टुकड़े कर माँ सदा बाँटती, चूल्‍हे की रोटी.

सी-सी करते बाट जोहते, खाते साग निरा,
आएगी अब सौंधी-सौंधी, चूल्‍हे की रोटी.

गीली-सूखी लकड़ी से जब, सुलगाती चूल्‍हा,
धूँए बीच महकती देखी, चूल्‍हे की रोटी.

चौका बरतन, दूध दोहना, कुँए से पानी,
गो-सानी, माँ के हिस्‍से थी, चूल्‍हे की रोटी.

क्या था जाने मन में उस दिन, संझा कम खाया,
छिपा लई मैंने धोती में, चूल्‍हे की रोटी.

जब देखा था मैंने माँ को, बिन खाए सोता,
चुपके से माँ को जा दे दी, चूल्‍हे की रोटी.

गंगा जमना बह निकली तब, समझ न पाया मैं,
ममता में भीगी थी कितनी, चूल्हे की रोटी.

माँ कहती थी जब भी चूल्‍हा, मिट्टी से पुतता,
पके अग्निपथ में जीवन ज्‍यों, चूल्‍हे की रोटी.

भूली बिसरी माँ की यादें, अब भी जेहन में,
भर आतीं आँखें जब देखूँ, चूल्‍हे की रोटी.

15 फ़रवरी 2018

अतुलित ऊर्जा ले प्राची से, जब सूर्योदय होता है (गीतिका)

छंद- ताटंक (16,14 अंत 3 गुरु से)
पदांत- होता है
समांत- उदय

अतुलित ऊर्जा ले प्राची से, जब सूर्योदय होता है.
उस ऊर्जा से जन जीवन का, तब अभ्‍युदय होता है.

इस ऊर्जा से चाँद सितारे, प्रकृति धरा भी हैं रोशन,
अंतिम व्‍यक्ति बने ऊर्जस्‍वी, तब अंत्‍योदय होता है.

युगों युगों से धरती घूमे, बाँट रही घर घर ऊर्जा,
जब लेते सापेक्षिक ऊर्जा, तब भाग्‍योदय होता है.

ऊर्जा का प्राकृतिक स्रोत यह, राष्‍ट्रोन्‍नति का मूल बने,
इस ऊर्जा से सर्वतोभद्र, तब सर्वोदय होता है.

प्रकृति ने दिये इस ऊर्जा से, शोक अशोक स्‍वभाव कई,
कभी कभी तो सूर्य स्‍वयं भी, तो ग्रस्तोदय होता है.

14 फ़रवरी 2018

महाशिवरात्रि पर एक गीतिका

गीतिका
छंद- गगनांगना छंद
शिल्‍प विधान- चौपाई+9, अंत 212.
पदांत- हैं
समांत- ओग

अभूतपूर्व शिव-शक्ति का, श्रीशिव योग हैं .
सृजन-संहार का इक शाश्‍वत, शिव उद्योग हैं.

सभी भाषाओं के भी उद्गम, हैं नादब्रह्म जो,
दशावतारी भी हैं वे कैसा, शिव संयोग हैं.

शंकराचार्य भजते शिवस्य हृदयं विष्णुको,
निराकार-साकार अनोखा, शिव सुयोग हैं.

अश्वत्थामा, कालभैरव, दुर्वासा, वृषभ,
नंदी, पिप्पलाद ये शिवांश, शिव आभोग हैं.

विश्वनाथ, विश्वगुरु नटराज, पशुपतिनाथ का,
जीवन दर्शन आदि आनंद, शिव प्रयोग हैं.

प्रकट हुए शिवलिंग रूप में, वे शिवरात्रि को,
जीवन सुदर्शन तभी अप्रतिम, शिव नियोग हैं.

आकुलनित्य भजें बैरागी, शिवा गृहस्थ को,
वे सर्वव्याप्त अशोकारिष्ट, शिव सहयोग हैं.
.

शिव-शक्ति का ही अभूतपूर्व योग हैं शिव (गीतिका )

गीतिका
पदांत- हैं शिव
समांत- ओग

शिव-शक्ति का ही अभूतपूर्व, योग हैं शिव.
सृजन-संहार का इक शुभ उद्योग हैं शिव.

सभी भाषाओं के भी उद्गम नादब्रह्म हैं वे,
दशावतारी भी हैं वे कैसा संयोग हैं शिव.

शिवस्‍य हृदयं विष्‍णु शंकराचार्य उवाच
निराकार-साकार अनोखा सुयोग हैं शिव.

अश्‍वत्‍थामा, कालभैरव, दुर्वासा, वृषभ,
नंदी, पिप्‍पलाद, शिवांश आभोग हैं शिव.

विश्‍वनाथ, महाकाल, व विश्‍वगुरु नटराज,
जीवन के स्‍पंदन का आनंद प्रयोग हैं शिव.

शिवंलिंग रूप में प्रकट हुए शिवरात्रि को
जीवन सुदर्शन का अप्रतिम नियोग हैं शिव.

पूजें सभी बैरागी गृहस्‍थ को ‘आकुल’,
वे ही व्‍याप्‍त अशोकारिष्‍ट प्रयोग हैं शिव.


25 जनवरी 2018

एक फिल्‍म के लिए देश में (गीत)

छंद- सरसी, 16,11. अंत 21
 
एक फिल्‍म के लिए देश में, आया है भूचाल.
गीदड़ भभकी है या यह है, वोट बैंक की चाल.
पहला थप्‍पड़ भंसाली अब, उच्‍चतम न्‍यायालय,
निर्णय की अवमानना से, फिर इक उठा सवाल.
एक फिल्‍म के लिए देश में..........’

यहाँ न्‍याय इतना क्‍यों बेबस, सरकारें भी मूक.
आजादी गणतंत्र दिवस पर, ले हाथों बंदूक.
तकनीकी युग में आ कर किस, मोड़ हैं’ हुए निढाल
एक फिल्‍म के लिए देश में..........’

जौहर की धमकी से कैसा, नारी सशक्तिकरण.
बाहर आकर जीतीं, घर में, कुचालें वशीकरण.
फिर इक बार बनी महिलायें, ‘शैतानों की ढाल.
एक फिल्‍म के लिए देश में..........’

इतिहास लिखा है हर युग में, स्‍त्री ही' हुई आहत.
जब भी अपने लड़े, हुए हैं, घर में महाभारत.
कैसी राजनीति अपने ही, क्‍यों अब खींचें खाल.
एक फिल्‍म के लिए देश में..........’

24 जनवरी 2018

धरती नभ पर छाया बसंत (गीतिका)

छंद- पदपादाकुलक
शिल्‍प विधान- मात्रा भार 16. आरंभ द्विकल से अनिवार्य.   
                   त्रिकल से आरंभ वर्जित. द्विकल के बाद यदि
                   त्रिकल है तो उसके बाद एक त्रिकल और आना
                   चाहिए.
पदांत- बसंत
समांत- आया

धरती नभ पर छाया बसंत.
फूलों ने महकाया बसंत.

होने को है अब शरद विदा
कोयल ने भी गाया बसंत

शादी, त्‍योहारों, पर्वों पे,
मेहमानों को लाया बसंत

अब फाग सभी मिल खेलेंगे
होली ने बुलवाया बसंत.

गायें धमार, रसिया गूँजें,
अब सबको मन भाया बसंत

खलिहान और सब खेत भरें,
फसलों ने फुसलाया बसंत  

आओ ‘आकुल’ भूलें कटुता,
संदेश लिये आया बसंत.