17 अगस्त 2017

इक मुसकान दे आएँ

छंद- विधाता
मापनी- 1222 1222 1222 1222
पदांत- दे आएँ
समांत- आन

किसी रोते हुए बच्चे, को’ इक मुसकान दे आयें.
किसी भूखे की’ झोली में, निवाला दान दे आयें.

कभी रोना कभी हँसना, यही जीवन सुदर्शन है,
किसी निर्धन के’ घर जाकर, उसे सम्मान दे आयें.

कहाँ मिलती हैं’ जीवन में, सभी को ही सफलतायें,
युवा पीढ़ी न भटके उन को' इक अभियान दे आयें.

अकेला जो चला है काफ़ि‍ले मिलते उसी को हैं,
अगर वे राह में पायें, उन्हें कुछ मान दे आयें.

दिया क्या देश ने तुमको, जरूरी ये नहीं ‘आकुल’,
दिया क्या देश को तुमने, यही पहचान दे आयें.

16 अगस्त 2017

राष्‍ट्रभक्ति की नींव डालनी होगी

-गीतिका-
पदांत- होगी अब
समांत- अनी

चित्र मंथन 166

राष्ट्रभक्ति की नींव डालनी होगी अब.
बचपन से ही प्रीत पालनी होगी अब.

देने होंगे बचपन से सुसंस्कार भी,
घर की’ अस्मिता भी सँभालनी होगी अब.

होना होगा प्रशिक्षित, आत्मरक्षा को,
नारी को क्षमता निखारनी होगी अब.

स्वावलंबी’ बनना होगा हर बाला को,
अबला की सूरत उतारनी होगी अब.

नारी है समर्थ उसकी नभ तक उड़ान,
महिलाओं की युद्ध वाहिनी होगी अब.

15 अगस्त 2017

आवाज़ दो हम एक हैं


  (देश भक्ति गीत)

पंद्रह अगस्‍त पर्व का यह दिन महान है.
उदित हुए सूरज को’ भी यह स्‍वाभिमान है.
यह उस धरा को दे रहा प्रकाश युगों से,
जहाँ देश सर्व धर्म से प्रकाशमान है.  

आओ चलो प्रकाश ये’ घर घर में’ फैलायें,  
आओ नए भारत का’ एक स्‍वप्‍न सजायें.
सोच लें हम एक हैं और एक रहेंगे,  
आओ नए भारत को’ एक स्‍वर्ग बनायें.  

राष्‍ट्र के इतिहास का यह क्षण महान है.
उदित हुए सूरज को भी’ यह स्‍वाभिमान है.   

ऋतुएँ यहाँ आती हैं’, रंग-रूप बदल के.
हवाएँ भी’ बहती हैं’, हर दिशा में झूम के.
होली, दिवाली, ईद, मनाते गले’ मिल कर,
संस्‍कृति यहाँ पलती हैं’, दिलों में’ हर एक के.

बलिदानों से’ वीरों के’ देश वर्द्धमान है.
उदित हुए सूरज को’ भी यह स्‍वाभिमान है.

निर्बल नहिं कर पायेगा’ दुश्‍मन कभी कोई.  
धूमिल नहिं कर पायेगा’ इसकी छवि कोई.
संगम हैं’ गंगा यमुना’ सरस्‍वती का यहाँ,
दूषित न कर पाए’गा मातृभूमि को’ कोई.
पवित्र धर्म ग्रंथों से मिला ये ज्ञान है.  
उदित हुए सूरज को’ भी यह स्‍वाभिमान है.

‘आवाज़ दो’ हम एक हैं’ और एक रहेंगे.
आतंकियों के’ अब नहीं अपराध सहेंगे.
क्‍या मिलेगा खून-खराबे से ऐ दुश्‍मन,
अब, प्‍यार से मिल, हर विषाद दूर करेंगे.

जो भी चला पथ शांति का विकासमान है. 
उदित हुए सूरज को’ भी यह स्‍वाभिमान है.


14 अगस्त 2017

जय श्री' कृष्‍णा

गीतिका
छंद- पियूष निर्झर (छंद लहरी)
पदांत- जय श्री' कृष्‍णा
समांत- आया
मापनी- 2122  2122  2122


नंद घर आ, नंद आया, जय श्री’ कृष्णा.
नंदनंदन चंद भाया, जय श्री’ कृष्णा.

जन्म अष्टम, गर्भ माया, सोई’ मथुरा,
कंस ने सुन, खार खाया, जय श्री’ कृष्णा.

शेष ने की, छत्र छाया, उतरी’ यमुना,
नंद ने गो, पाल पाया, जय श्री’ कृष्णा.

मन चुरा, माखन चुराया, गऊ’ चराई,
रास राधा, सँग रचाया, जय श्री’ कृष्णा.

गिरि उठा गो, धन बचाया, इंद्र ढाया,
कंस के डर, को मिटाया, जय श्री’ कृष्णा.

देवकी वसु-देव दोनों, भी सिहाये
ब्रज में' मथुरा, को मिलाया, जय श्री’ कृष्णा.

पार्थ ने तब, ज्ञान पाया, धर्म जाना ,
ज्ञान गीता, का सुनाया, जय श्री’ कृष्णा

13 अगस्त 2017

सत्‍य समझाने की बात कर


गीतिका
पदांत- की बात कर 
समांत- आने
मापनी- 2212 2212 2212 12

पिछड़े हुए को साथ में लाने की’ बात कर.
भटके हुए को राह दिखलाने की’ बात कर.

ढेरों मिलेंगे शूल हर पथ पर विकास के,
हारे हुए को हाथ दे आने की’ बात कर.

मिलती कहाँ हैं शांति मन में तृप्‍त जो नहीं,
बहके हुए को सत्‍य समझाने की’ बात कर.

अब पक्षियों की चहक भी  होने लगी है’ कम,
उजड़े हुए घर उन के’ लौटाने की’ बात कर.

कम हो रहे हैं बाग वन दूषित हवा चले,
सूखे हुए मधुबन को’ सरसाने की’ बात कर.

सीमित रहें ज्‍योनार हों न बुफे के’ चोंचले,
उच्छिष्‍ट हुए’ भोजन को’ बँटवाने की’ बात कर.

‘आकुल’ प्रकृति से नेह रख, धरती को’ तू बचा,
छाये हुए मेघों को’ बरसाने की’ बात कर.  

9 अगस्त 2017

दूर क्षितिज तक पहुँचायें संदेश (गीतिका)

पदांत- संदेश
समांत- आयें


चलो प्रेम का, दूर क्षितिज तक, पहुँचायें संदेश.
अमन चैन का, अंतरिक्ष पर फैलायें संदेश.

नहीं प्रेम सा, कोई मरहम, नहीं प्रीत सी छाँव,
चलो ओम् का, शंख फूँक कर, गुंजायें संदेश.

हृदय स्वच्छ निर्मल हो, जीवन छल प्रपंच से दूर,
चलो नेह के, अंतस् तल पर, बरसायें संदेश.

सभी धर्म-संस्कृति की रक्षा, करें प्रेम नि:स्‍वार्थ,
चलो धर्म संस्थापनार्थाय, सिखलायें संदेश.

अखिल ब्रह्म हो प्रेममय, ये कहें मर्म बेलून,
चलो दूर, नभ से ब्रह्म-मुहूर्त, कह जायें संदेश

8 अगस्त 2017

चार मुक्‍तक



रोला मुक्‍तक
गर्मी में ज्यों लाय, पड़ें सरदी में ओले. 
कहीं सताती बाढ़, कहीं दुर्भिक्ष फफोले.  
पतझड़, आँधी, धुंध, प्रकृति के रूप हजारों, 
प्रकृति प्रदूषण त्रस्‍त, धरा नित बदले चोले.

रोला मुक्‍तक
शीतल बही बयार, मेघ गरजे चपला सँग.
आने को बरसात, धरा ने भी बदला रँग.
थलचर, नभचर नीड़, घरोंदे लगे बचाने,
दादुर चहके, मोर, प्रकृति भी नाचे सँग-सँग.

मुक्‍तक  
मधुर क्षणों को लें समेट, कटुता को भूलें. 
भेदभाव को त्‍यागें, मद में कभी न फूलें 
चार दिनों का मेला जीवन जी लें जी भर,  
कर प्रगाढ़ रिश्‍तों को, आसमान को छू लें.

मुक्‍तक  
कटु अनुभव ही सिखलाते जीवन में जीना
सागर से सीखें विष को आजीवन पीना,
जो विष पीते, नीलकण्‍ठ होते जीवन में,
कब थकते हैं श्रमिक बहाते अथक पसीना.