29 दिसंबर 2011

नववर्ष तुम्‍हारा अभि‍नन्‍दन

वि‍गत वर्ष अब साँसें थामे
करने को आगत का स्वागत
अति‍ उत्सहि‍त है,’अभ्यागत’
आओ हे नववर्ष तुम्हारा अभि‍नन्दन।


रश्मिरथी के दि‍व्यासन पर सप्तशृंगार कि‍ये आए हो
उदधि‍ वि‍लोडन से नि‍कला क्या हालाहल अमृत लाए हो
आशाएँ बहुतों ने तुमसे हैं बाँधी
भरे फफोलों हाथों झेली हैं आँधी
बरकत दो इस वर्ष तुम्हारा अभि‍नन्दन।

परि‍णति‍ हो ऐसी सुख समृद्धि‍ घर आए
घर का भेदी कभी कहीं ना लंका ढाये
लाओ खुशि‍याँ घर में रोली कुमकुम बरसे
कोई कहीं ना लुटापि‍टा सा गुमसुम तरसे
उत्कर्ष बने यह वर्ष तुम्हारा अभि‍नन्दन।

चहुँ दि‍श प्रगति‍ राष्ट्र की प्रशस्‍त बने
हर तबके को न्याय मि‍ले आश्वस्त‍ बने
हर माँ अब अपनी कोखों से वीर जने
लि‍खें वीर रस कवि‍ कवि‍ता नवगीत बने
स्वागत है इस वर्ष तुम्हारा अभि‍नन्दन।


25 दिसंबर 2011

सान्‍नि‍ध्‍य सेतु: साहि‍त्‍यि‍क सांस्‍कृति‍क कला संगम अकादमी, परि‍याव...

सान्‍नि‍ध्‍य सेतु: साहि‍त्‍यि‍क सांस्‍कृति‍क कला संगम अकादमी, परि‍याव...: कोटा। 30 अक्टूबर को महाभारत के शि‍खर शांतनु, मृत्‍युंजय भीष्म और मत्स्‍यगंधा की जन्मभूमि‍ परि‍यावाँ में जो उत्तरप्रदेश के प्रातापगढ़ जि‍ले स...

22 दिसंबर 2011

फि‍र आएगा नया साल

नव ऊर्जा सुप्रभात लि‍ए
फि‍र आएगा नया साल।


इक इति‍हास लि‍खा कल ने
पूरब की धरा हुई रक्तिम
प्रकृति‍ की चढ़ी रही भृकुटी

इक दि‍न भी शांत रही ना जो
कैसे कटे रैन दि‍न बोझि‍ल
कुटि‍ल दुपहरी साँझ कटी

अब कौन नया उत्पात लि‍ए

वेद पुराण गीता कुरान सब
धरे रि‍हल पर धूल चढ़ी
क्षुण्ण क्षुब्ध मानव मन कामि‍ल

नहीं दृष्टि में नीलकण्ठ कहिं
क्षणभंगुर श्वासों के कलरव
भृंग मोह भंग कहाँ अजामि‍ल


और कौन सी घात लि‍ए

ऋतु संहार न कर पाया मनु
चंद्र कला,उदधि‍ प्रचण्ड को
देख रहा जग कर दि‍नकर नि‍त

धरा मौन चातक संयम धर
स्वाति‍ विंदु के लि‍ए प्रतीक्षि‍त
तन-मन-धन करने को अर्पि‍त


मानव कल अज्ञात लि‍ए

4 दिसंबर 2011

शि‍क्षा ऐसी हो

शि‍क्षा ऐसी हो हमको संस्कार सि‍खाए।
’वि‍द्या ददाति‍ वि‍नयम्’ हमें वि‍नम्र बनाए।
’नीर-क्षीर-वि‍वेक’, न्‍याय की महि‍मा गाए।
’वसुधैवकुटुम्ब्कम्’ का हमको सन्मार्ग दि‍खाए।।
शि‍क्षा ऐसी हो-------------'
मात-पि‍ता-गुरु-बंधु-बांधवों से पोषि‍त हो।
नारी-वृद्ध-असहाय कहीं भी ना शोषि‍त हो।
मनु की दुनि‍या में मानव फि‍र परि‍भाषि‍त हो।
'सर्वधर्म समभाव’, प्रेम का पाठ पढ़ाए।।
शि‍क्षा ऐसी हो---------------'
ब्रह्मा-वि‍ष्णु-महेश सी हों राज व्यवस्थायें।
कर्मक्षेत्र में कभी न पनपें महत्वाकांक्षाएँ।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, अध्यात्म परम्पराएँ।
’सर्वेभवन्तु सुखि‍न:’का जो मर्म बताए।।
शि‍क्षा ऐसी हो----------------'
वृक्षारोपण,स्वच्छ धरा और हरि‍त आभूषण।
जनजाग्रति‍,जनसंख्या घटे और छटे प्रदूषण।
सर्वशि‍क्षा अभि‍यान, प्रकृति‍ से प्रेम आकर्षण।
राष्ट्रवि‍कास के लि‍ए जो तन-मन-धन बि‍सराये।।
शि‍क्षा ऐसी हो-------------------'
वेद-पुराण-गीता-कुरान प्रकाश फैलाएँ।
'अति‍थि‍ देवोभव’ संस्कृति‍ की हवा बहाएँ।
'भारत मेरा है महान्’ जन-गण-मन गाएँ।
वीरों की भूमि‍ है जो बलि‍दान सि‍खाए।।
शि‍क्षा ऐसी हो------------'
यह प्रताप भामाशाहों की गर्व भूमि‍ है।
बापू लाल जवाहर की यह कर्म भूमि‍ है।
वीर शि‍वाजी रणबाँकुरों की धर्म भूमि‍ है।
रग-रग वीरों की गाथा रोमांच जगाए।।
शि‍क्षा ऐसी हो-----------------'