20 जुलाई 2017

जिंदगी को न हार जाना है (गीतिका)




छंद- रारायगा छंद
मापनी- 2122  1212  22
पदांत- है
समांत- आना

कुछ न बोलो, यही जमाना है.
बढ़ के’ आफत, गले लगाना है.

धैर्य जब से, है’ आदमी भूला,
भूल होगी, उसे सिखाना है.

सब दिखावे, के’ रह गये रिश्‍ते,
सोच कर ही, उन्‍हें निभाना है.   

उम्र ने हैं, कई मिसालें दी,
अब किसी को, न आजमाना है.  

जन्‍म पाया, है’ हाल हर ‘आकुल’
जिंदगी को, न हार जाना है.


16 जुलाई 2017

शृंगार करूँ (गीतिका)



पदांत- करूँ
समांत- आर
मापनी- 16//14

धीरज रख मन, पी आयेंगे, कुछ तो मैं शृंगार करूँ.
पहले म्‍हावर या मे'हँदी से, हाथ-पैर गुलज़ार करूँ.

पहनूँ चुनरी और लहरिया, छम-छम पहनूँ पैंझनियाँ,
फिर सोचूँगी पी आने पर, कैसे मैं मनुहार करूँ.

सखियों के सँग झूला झूलूँ, पर मन तो है राह तके,
कह न सकूँ मैं सखियों से भी, कितना उनसे प्यार करूँ.

आए पी हुलसा तन-मन जब, सखियों ने भी चुहल करी,
बरसी आँखें देखूँ उनको, नैनों से बौछार करूँ.

सावन भादों जैसे धरती, हरियाली के रंग भरे
ऐसे ही हर रँग में रँग कर, बस पी को स्वीकार करूँ.

15 जुलाई 2017

बच्‍चों को वर्षा क्‍या सारे मौसम भाते हैं. (गीतिका)


पदांत- हैं
समांत- आते

बच्चों को वर्षा क्या सारे, मौसम भाते हैं.
इसलिए कि उनको न कभी सुख, दुख तरसाते है. 

कहाँ जानते हैं वे होता, है क्या सच व झूठ 
क्या होता है डर कब कैसे, इसे सिखाते हैं. 

पहली बारिश में कितने ही, होते कौतूहल,  
नाव चले कैसे, कागज की, नाव बहाते हैं

 तन को फुला-फुला पंछी क्यों, बैठे शाखों पर,  
कहाँ जानते पिक चुप क्यों, दादुर टर्राते हैं. 

बचपन से बँध जाते घर से, कहाँ जान पाते, 
पर आते ही पंछी घर से, क्यों उड़ जाते हैं.

14 जुलाई 2017

पावस ने (गीतिका)



छंद- विधाता
मापनी- 1222 1222 1222 1222
पदांत- है
समांत- आई

धरा पर आज पावस ने, हरित चादर बिछाई है.
मुदित कण कण हवा भी सर्द हो कर मुसकुराई है.

नई कोंपल नई शाखें, नये मधुकोश, नव-जीवन,
सभी को सृष्टि ने पहली, हरी चूनर उढ़ाई है.

कहीं नर्तन मयूरी के, कहीं छूते गगन पंछी,
कहीं कलियों ने फूलों से, अदा हँसने की पाई है.

कहीं मानव की हठधर्मी, कहीं सूरज की सरगर्मी,
सभी को कर किनारे वक्‍़त ने कीमत चुकाई है.

चलो ‘आकुल’ प्रकृति ने फिर, पहल तो की, भरी ऊर्जा,
खिजाँ जा कर बहारों से पुन: सौगात लाई है.

9 जुलाई 2017

गुरु पूर्णिमा पर तीन मुक्‍तक


1
अक्षर ज्ञान दिवाय के, उँगली पकड़ चलाय.
गुरु ही पार लगाय या, केवट पार लगाया.
मात-पिता-गुरु तीन के, उस पर रहते हाथ,
शिक्षा कोई क्षेत्र हो, बिन गुरु कभी न आय. 
2
नमन करो तुम कृतज्ञता से, जनक, गुरु, ईश्‍वर का.
तदुपरांत तुम नमन करो, धरा, देश और घर का.
अपने और पराये का मत लाओ मन में भाव,
बन कृतज्ञ तुम लाभ प्राप्‍त कर पाओगे अवसर का.
3
प्रवचन, संत-समागम, सेवा, जीवन में उपकारी.
भ्रमण, ध्‍यान, व्‍यायाम, योग, दिनचर्या है हितकारी.
पति-पत्‍नी का और सखा का संग-साथ हो सुखकर,
मात-पिता-गुरु का जीवन में, वरद हस्‍त बलिहारी.

4 जुलाई 2017

दो 'दोहा मुक्‍तक'



 चतुर्मास
  मुनि, महंत अरु संत सब, करते प्रभु का ध्‍यान.
देवशयन करते प्रभू, जब तक देवोत्‍थान.
चतुर्मास में इसलिए, हैं निषेध शुभकार्य,
पावस मन विचलित करे, आते सौ व्‍यवधान.  

मन
 इस मन की अब क्या कहूँ, बैठा है ले आस.
निर्मोही पी लो सुधी, आया चातुर्मास.
सावन के झूले पड़े, नहिं सोहे शृंगार,
अंतर्मन विचलित रहे, बढ़ती जाए प्यास.